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कुँवर चैनसिंह, अंग्रेजो से लड़ते-लड़ते जब गर्दन कट गई तो इनका घोड़ा धड़ लेकर घर आया था!

जब देश भर में अंग्रेजी हुकूमत थी, कुशासन का दौर था तब मध्यभारत में सबसे पहले अंग्रेजो को सबक सीखने वाले और अंग्रेजों के विरोध बिगुल बजाने वाले नायक थे नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह जिन्होंने अपनी अल्प आयु में अंग्रेजी सेना को छठी का दूध याद दिला दिया था। यह घटना आज़ादी के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माने जाने वाले 1857 के विद्रोह से भी 33 वर्ष पूर्व की हैं।

दरअसल, वर्ष 1824 की बात हैं, नरसिंहगढ़ रियासत पर ‘रावत सोभाग सिंह का शासन था और उनकी 1824 के आसपास स्वास्थ्य ख़राब चल रहा था। स्वास्थ्य ख़राब होने के चलते प्रसाशन की बागडोर राजकुमार कुंवर चैन सिंह को सौंपी गई थी।

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मालवा समेत पुरे भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आवाज़ उठने लगी थी, हर कोई अंग्रेजी शासन की नीतियों और हत्याचार से परेशान था। भारत में व्यापारी के रूप में आई ईस्ट इंडिया कंपनी की हड़प नीति के चलते राजे-रजवाड़े और आम नागरिक बहुत प्रताड़ित और व्यथित हो रहे थे। अपनी विस्तारवादी लिप्सा के चलते कंपनी जहां रजवाड़ों और रियासतों को अधिकार विहीन कर रही थी। वहीं व्यापार के बहाने नागरिकों का दोहन भी कर रही थी। इस वजह से यदा कदा कंपनी की खिलाफत के सुर भी सुनाई पड़ने लगे थे। कंपनी के खिलाफ मध्यभारत सबसे पहले खड़े होने वाले योद्धा थे कुंवर चैन सिंह।

भोपाल के नवाब और ईस्ट इंडिया कम्पनी के मध्य हुआ समझौता

दरअसल, वर्ष 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी और भोपाल के तत्कालीन नवाब के बीच हुए समझौते के बाद कंपनी ने सीहोर में एक हजार सैनिकों की छावनी बनाई। कंपनी द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को इन फौजियों का प्रभारी बनाया गया। इस फौजी टुकड़ी का वेतन भोपाल रियासत के शाही खजाने से दिया जाता था। समझौते के तहत पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक को भोपाल सहित नजदीकी नरसिंहगढ़, खिलचीपुर और राजगढ़ रियासत से संबंधित राजनीतिक अधिकार भी सौंप दिए गए। खिलचीपुर और राजगढ़ आदि तो चुप रहे, लेकिन इस फैसले को नरसिंहगढ़ रियासत के युवराज कुंवर चैन सिंह ने गुलामी की निशानी मानते हुए स्वीकार करने से इंकार दिया। कुंवर चैन सिंह स्वाभिमानी व्यक्तित्व के थे, उन्हें यह समझौता रास नहीं आया।

अंग्रेजो के लिए खतरा बन चुके थे

कुंवर चैन सिंह अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बन थे, रियासत से गद्दारी कर रहे अंग्रेजों के पिट्ठू दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा को कुंवर चैन सिंह ने गद्दारी करने के कारण मार दिया। गद्दार मंत्री रूपराम के भाई ने कुंवर चैन सिंह के हाथों अपने भाई के मारे जाने की शिकायत कलकत्ता स्थित गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल के निर्देश पर पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक बैठक के लिए बुलाया। बैठक में चैन सिंह शामिल हुए।

अंग्रेजी पोलिटिकल एजेंट मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को दीवान आनंदराम बख्शी और मंत्री रूपराम बोहरा की हत्या के अभियोग से बचाने के लिए दो शर्तें रखीं। पहली शर्त थी कि नरसिंहगढ़ रियासत, अंग्रेजों की अधीनता स्वीकारे। दूसरी शर्त थी कि क्षेत्र में पैदा होनेवाली अफीम की पूरी फसल सिर्फ अंग्रेजों को ही बेची जाए। यानी इस तरीके से वह उनकी रियासत को अपने आधीन करना चाहता था लेकिन कुंवर चैन सिंह को यह सब रास नहीं आया। उन्होंने अंग्रेजों को सबक सिखाने का मन बना लिया था।

कुंवर चैन सिंह ने एजेंट मैडॉक की शर्तों को ठुकरा दिया और एजेंट मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह को 24 जुलाई 1824 को सीहोर पहुंचने का आदेश दिया, चैन सिंह को आशंका था लेकिन फिर भी वह बहादूर थे इसलिए अपने विश्वास पात्र सारंगपुर निवासी साथी हिम्मत खां और बहादुर खां समेत मात्र 43 सैनिकों की छोटी से सैन्य टुकड़ी के साथ सीहोर छावनी पहुंच गए।

सीहोर पहुंचने के बाद अंग्रेजी सैनिक, एजेंट मैडॉक और कुंवर चैन सिंह के बीच मुठभेड़ हुई। अंग्रेजों की सुव्यवस्थित और आधुनिक तोपे, बंदूकों वालीं बड़ी सेना से चैन सिंह की छोटी लेकिन बहादुर सेना ने जमकर मुकाबला किया। कुंवर चैन सिंह ने अपनी तलवार से अंग्रेजो की अष्टधातु से बनी तोप पर वार किया, जिससे तोप तो कट गई मगर उनकी तलवार उसमे ही फंस गई। इसका फायदा उठाते हुए धोखे से अंग्रेजी तोपची ने उनकी गर्दन पर वार कर दिया जिससे उनकी गर्दन और धड़ अलग – अलग हो गई। वह शाहदत को प्राप्त हुए।

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मृतक शरीर को घोडा लेकर आया नरसिंहगढ

लोगों में प्रचालित हैं और माना जाता हैं कि कुंवर चैन सिंह की शहादत के बाद उनका घोडा उनकी धड़ को लेकर सीहोर से नरसिंहगढ़ लेकर आ गया था, जहाँ नरसिंहगढ़ छार बाग़ में उनकी छतरी बनाई गई हैं। उनकी पत्नी कुँवरानी बाईसा ने जलमंदिर के किनारे शहीद कुंवर चैन सिंह की याद में ‘कुंवरानी जी का मंदिर’ बनवाया हैं।

हमें गर्व हैं उनके वंशज होने पर

जब हमने कुंवर चैन सिंह के मौजूदा वंशज युवराज वीर विक्रम सिंह से बात की तो उन्होंने कहा, ‘हमें गर्व हैं कि हम कुंवर चैन सिंह जी के वंशज हैं, जो भारत के पहले स्वतंत्रता सैनानी हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भी उन्हों से प्रेरणा ली थी।’

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24 जुळाई 1824 की घटना कुंवर चैन सिंह और उनके साथीयों के बलिदान के लिए उन्हें मध्यभारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2005 से सीहोर के दशहरा बाग़ स्थित कुंवर चैन सिंह की छत्री पर उन्हें प्रतिवर्ष गॉर्डऑफ़ ऑनर दिया जाता हैं जबकि नरसिंघगढ़ में इस दिन क़ौमी एकता दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।

पुरे नरसिंहगढ़ और मालवा क्षेत्र के सभी लोगों को आज भी अपने इस बहादुर राजकुमार पर गर्व हैं, मध्यप्रदेश सरकार ने उनकी याद में ‘कुंवर चैन सिंह सागर’ का निर्माण कराया हैं। साथ ही नरसिंहगढ़ के स्थानीय प्रशासन ने उनकी प्रतिमा शहर के ‘छत्री चौराहा’ पर लगाई गई है। साथ उनकी मिटटी को शहीद स्मारक दिल्ली में भी डाला गया। उनकी जीवनी मध्यप्रदेश के पाठ्यक्रम में शामिल हैं।

Written by Devraj Dangi

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