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DMK सांसद कनिमोझी के बाद पूर्व CM कुमारस्वामी बोले, ‘हिंदी भाषा ने दक्षिण के लोगों को PM बनने से रोका’

आज़ादी के बाद से ही देश में भाषा विवाद एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा हैं, तमिल से आंध्र भाषाई आधार पर ही बना था। अब तमिलनाडु से डीएमके सांसद कनिमोझी ने फिर एक बार भाषा को लेकर देश में नया विवाद खड़ा कर दिया हैं। इसमें दक्षिण भारत के कई दिग्गज नेता भी कूद गए हैं। दरससल, डीएमके सांसद कनिमोझी से एयरपोर्ट पर CISF अधिकारी ने हिंदी में सवाल किया था जब उन्होंने ने तमिल या अंग्रेजी में पूछने को कहा तो अधिकारी ने पलट कर पूछा क्या आप भारतीय नहीं हो। इसके बाद से ही भाषा का मुद्दा एक बार से राजनीतिक हथियार बनता दिख रहा हैं।

डीएमके सांसद कनिमोझी के ट्वीट के बाद से ही दक्षिण भारत में भाषा को लेकर हिंदी विरोध के सुर तेज होते दिख रहे हैं। आज सुबह पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने अपने साथ घटी घटना को साझा किया था और उसके जनता दल सेक्युलर के नेता और कर्नाटक के पूर्व सीएम कुमारस्वामी ने कई सारे ट्वीट करते हुए बड़े आरोप लगाते हुए पूछा कि हिंदी भाषा राजनीति अक्सर दक्षिण भारतीय नेताओं से मौका छिनती हैं। यानी कुमारस्वामी ने हिंदी की आड़ में राजनीति करना शुरू का दिया हैं।

कर्नाटक के पूर्व सीएम एचडी कुमारस्वामी ने लिखा, ‘डीएमके की सांसद से पूछा गया कि क्या आप भारतीय हैं ? कनमोझी के साथ हुए इस अपमान के खिलाफ मैं अपनी आवाज़ उठाता हूँ। ये बहस का विषय हैं कि किस तरह दक्षिण भारत के नेताओं से हिंदी भाषा राजनीति ने अवसर छीन लिए हैं। हिंदी राजनीति ने कई दक्षिण भारतीय नेताओं को प्रधानमंत्री बनने से रोका हैं।’

Hindi imposition ruined chances for many: Chidambaram, Kumaraswamy ...
Credits: the news minute

कुमार स्वामी यही नहीं रुके उन्होंने आगे कई ट्वीट करते हुए लिखा, ‘एचडी देवगौड़ा,, करूणानिधि, कामराज इनमे प्रमुख हैं। हालांकि, देवगौड़ा इस बाधा को तोड़ने में सफल रहे, लेकिन ऐसे कई मौके आये जब उन्हें भाषा को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा। तब हिंदी राजनीति सफल भी हो गई थी, जब देवगौड़ा को लालकिले से हिंदी में भाषण देना पड़ा। पीएम देवगौड़ा इसलिए माने की क्योंकि अधिकतर किसान उत्तरप्रदेश – बिहार से थे।’ कुमारस्वामी और चितम्बर के ट्वीट ने जरूर इस मुद्दे को आग लगाने का काम किया हैं। खासकर तमिलनाडु में भाषा एक बड़ा मुद्दा रहा हैं, हिंदी विरोध कई बार देखा गया हैं।

कर्नाटक के पूर्व सीएम कुमारस्वामी आगे लिखते हैं कि, ‘मेरे साथ भी यही अनुभव रहा, मैं दो बार लोकसभा का सदस्य रहा हूं। सत्ताधारी दल दक्षिण भारत के लोगों को इग्नोर करते हैं। मैंने करीब से देखा है कि किस तरह हिन्दी राजनीति अपनी चलाते हैं और नॉन हिन्दी राजनेताओं का सम्मान नहीं करते हैं।’ जबकि कुमार स्वामी ये बात भूल गए कि उनके पिता एचडी देवगौड़ा इस देश के प्रधानमंत्री रहे, उनके बाद आंध्रप्रदेश से आने वाले पी. वी. नरसिम्हा राव भी देश के प्रधानमंत्री रहे जो भी हिंदी भाषी थे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गैर – हिंदी भाषी यानी गुजराती भाषी हैं, खैर बात अलग हैं की उन्हें हिंदी की अच्छी समझ हैं। लेंकिन यह तीनो गैर – हिंदी भाषा क्षेत्र से आते हैं जो देश के प्रधानमंत्री बने हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा कि, ‘सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि सरकारी, प्राइवेट जॉब के लिए भी लोगों को अंग्रेजी या हिन्दी लिखनी पड़ती है। इस साल भी IBPSmosa में कन्नड़ को कोई जगह नहीं मिली है। कन्नड़ लोगों को मौका नहीं दिया जा रहा है, ये रुकना चाहिए। केंद्र सरकार कहती है कि हिन्दी कई भाषाओं में सिर्फ एक है, लेकिन करोड़ों रुपये देश और विदेश में हिन्दी का प्रचार करने में खर्च करती है। ये एक छुपा हुए कार्यक्रम की तरह है, इससे तभी लड़ा जा सकता है जब आप हर भाषा के प्रति सम्मान रखें।

आपको बता दें कि जब से देश में नई शिक्षा नीति आने के बाद से ही हिन्दी भाषा थोपने को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्य मोर्चा खोले हुए हैं। इसी के बाद से ही कई अन्य नेताओं ने भी आवाज बुलंद की है।वही डीएमके सांसद ने सभी नेताओं के द्वारा उन्हें मिले समर्थन के बाद कनिमोझी ने सभी का शुक्रिया किया। आपको बता दे कि तमिलनाडु में सत्तधारी पार्टी भी नई शिक्षा नीति का खुलकर विरोध कर चुकी हैं।

Written by Devraj Dangi

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