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हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ को लेकर पुलिस के दावों पर उठ रहे ये बड़े सवाल

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के पास एक महिला डॉक्टर के साथ गैंगरेप और उनकी हत्या के चार अभियुक्तों को शुक्रवार सुबह कथित मुठभेड़ के दौरान स्थानीय पुलिस ने गोली मार दी थी जिसे बहुत से लोगों ने ‘वीरतापूर्ण’ बताते हुए इसकी प्रशंसा की.

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Photo credit- bbc.com

लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो इस कथित एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं और इसकी निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस घटना का संज्ञान लेते हुए एक टीम को जाँच के निर्देश दे चुका है जिसका नेतृत्व एक एसएसपी स्तर के अधिकारी करेंगे और जल्द से जल्द आयोग को अपनी रिपोर्ट सौपेंगे.

वहीं तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वो चारों अभियुक्तों के शव 9 दिसंबर शाम 8 बजे तक परिरक्षित रखे और उनके पोस्टमॉर्टम का वीडियो कोर्ट में जमा करवाए.

इस बीच मारे गए अभियुक्तों के परिजनों ने कोर्ट में मुक़दमा चलाए जाने से पहले ही पुलिस द्वारा उन्हें मुठभेड़ में मार गिराने पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि पुलिस की कहानी पर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा.

एनकाउंटर का समय

सज्जनार ने कहा कि ‘अभियुक्तों को इतनी सुबह अपराध की जगह इसलिए ले जाना पड़ा क्योंकि उनकी सुरक्षा को लेकर ख़तरा था. लोगों में उन्हें लेकर बहुत गुस्सा था.

“ये दलील विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि पुलिस दिन की रोशनी में बड़े आराम से यह काम कर सकती थी. वो अतिरिक्त पुलिस बल के साथ इलाक़े की घेराबंदी कर सकते थे. और ‘लोगों के डर’ से सज्जनार का क्या मतलब है? क्या वो ये मान रहे हैं कि भीड़ पुलिस की मौजूदगी में भी लिंचिंग कर सकती है?”

“पुलिस ने कहा कि ये चार लोग ही अभियुक्त हैं और जनता ने उनकी बात पर विश्वास किया. इसकी कोई न्यायिक जांच नहीं हुई. पुलिस ने एक सप्ताह पहले प्रेस रिलीज़ जारी कर ये दावा किया था कि चारों ने जुर्म कुबूल कर लिया है. पुलिस ने तो ये दावा भी किया था कि चारों ने कैमरे पर सारे डिटेल बताए हैं. और जब चारों ने कथित तौर पर लिखित में अपना जुर्म कुबूल कर लिया था तो फिर उन्हें मौक़े पर ले जाकर ये जाँच क्यों हो रही थी? वो भी अंधेरे में.”

मुठभेड़ का दावा

“पुलिस हिरासत में चल रहे अभियुक्तों को डंडे और पत्थर मिल कहाँ से गए? चार अभियुक्तों पर दस पुलिसकर्मी कोई कम संख्या नहीं है जो उनके हथियार छिन जाएं. और अगर ऐसा हुआ है जिसे पुलिस अपनी कहानी में मान भी रही है, तो सीनियर अधिकारियों पर इसे लेकर गंभीर सवाल उठते हैं.”

यह बात हज़म नहीं हो पारही हे की दो अभियुक्तों ने पुलिस से हथियार छीन लिए होंगे. “ये पुलिसकर्मी हैं या तमाशा. कैसे 20 वर्ष के लड़के आपसे पिस्टल छीन सकते हैं. ऐसी किसी ड्यूटी पर तो अतिरिक्त सावधानी रखनी होती है. पुलिस ने क्यों नहीं बताया कि उन लड़कों ने पिस्टल छीनने के बाद कितने राउंड फ़ायर किये?”

“ये क्रिमिनल थे, इसमें कोई शक़ नहीं. लेकिन चारों अभियुक्त बहुत तनाव में थे. इनकी उम्र 20 के आसपास थी. ऐसी रिपोर्टें हैं जिनमें कहा गया कि जेल में उन्हें खाना नहीं दिया गया. जिस बैरेक में उन्हें रखा गया वहाँ अन्य क़ैदियों ने उन्हें पीटा. लोग कह रहे थे कि इन्हें वकील नहीं मिलना चाहिए. दो दिन से वो न्यायिक हिरासत में थे. ऐसे में ये बड़ा असंभव लगता है कि इन चारों ने दस हथियारबंद पुलिसवालों के सामने कोई हरक़त की होगी.”

“चारों अभियुक्तों को ये ज़रूर पता होगा कि वो पुलिस से बचकर भाग भी गए तो भीड़ उन्हें ज़िंदा जला देगी. ऐसे में वो पुलिस से बचने की कोशिश करेंगे ही क्यों?”

‘घायल’ पुलिसकर्मी

वीसी सज्जनार ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दावा किया कि चारों अभियुक्तों को ढेर करने में पुलिस को क़रीब दस मिनट लगे. यानी खुले मैदान में इस दौरान अभियुक्तों और पुलिस के बीच क्रॉस-फ़ायरिंग होती रही.

जिसका अंत ये हुआ कि चारों अभियुक्तों की गोली लगने से मौत हो गई. लेकिन एक भी पुलिसकर्मी को गोली ने नहीं छुआ.

पुलिस कमिश्नर के अनुसार इस मुठभेड़ में दो पुलिस अधिकारी घायल हुए जिन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया क्योंकि उनके सिर में चोट है जो डंडे या पत्थर से लगी है.

दिल्ली के पूर्व पुलिस उपायुक्त मैक्सवेल परेरा कहते हैं, “पुलिस कमिश्नर का ये बयान बहुत शर्मनाक और ग़ैर-पेशेवर है. ये बिल्कुल यूपी स्टाइल है. जब मैं दिल्ली पुलिस में था तब यूपी के अपराधी दिल्ली में आकर सरेंडर करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यूपी पुलिस सरेंडर करने पर भी उन्हें गोली मार देगी. देश का क़ानून अपराधियों को भी अपनी दलील देने का अधिकार देता है और इससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.”

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार अब इस मामले की जाँच होगी, तभी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी क्योंकि सुनने में पुलिस कमिश्नर की ये कहानी बहुत घिसी-पिटी लगती है.

हर बार एक जैसी कहानी कैसे?

तेलंगाना के वरिष्ठ पत्रकार एन वेणुगोपाल राव राज्य के इतिहास का हवाला देकर पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि हर बार पुलिस की कहानी में इतनी समानता कैसे होती है?

वो बताते हैं, “तेलंगाना पुलिस (पहले आंध्र प्रदेश पुलिस) का ऐसी कहानियाँ ‘सुनाने’ का इतिहास रहा है. वो इसमें बहुत निपुण हैं. 1969 के बाद से वो एनकाउंटर के ऐसे संदिग्ध किस्से सुना रहे हैं. इस तरह की मुठभेड़ों की शुरुआत नक्सलियों के ख़िलाफ़ हुई थी जिसपर सिविल सोसायटी ने कभी सवाल नहीं उठाया. लेकिन 2008-09 के बाद से पुलिस ने ये रणनीति आमतौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.”

“जब तेलंगाना का निर्माण हुआ और इस क्षेत्र में तेलंगाना आंदोलन चल रहा था तब चंद्रशेखर राव समेत अन्य टीआरएस नेताओं ने यहाँ की पुलिस पर आरोप लगाया था कि आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ग़लत तरीक़े अपना रही है. लेकिन जैसे ही वे पावर में आये, तो उनकी सरकार में पुलिस ने नालगोण्डा ज़िले में चार कथित मुस्लिम चरमपंथियों को वारंगल जेल से हैदराबाद कोर्ट के रास्ते में शूट किया और पुलिस ने बिल्कुल यही कहानी दुनिया को बताई. ये 2014 का वाक़या है.”

“लेकिन ये कहानी 1969 से शुरू होती है. तब आंध्र प्रदेश में पहला एनकाउंटर हुआ था. आंध्र पुलिस ने कलकत्ता से आ रहे सीपीआई (एमएल) के सात सदस्यों को रेलवे स्टेशन पर उतरते ही गिरफ़्तार किया और फिर उन्हें गोली मार दी. उस साल पुलिस ने एनकाउंटर की जो कहानी सुनाई थी, वो कहानी आज तक वैसी की वैसी है, बस पात्र, तारीख़ें और जगहें हर बार बदल जाती हैं.”

हैदराबाद डॉक्टर रेप केस का ज़िक्र करते हुए एन वेणुगोपाल राव ने कहा कि दिसंबर 2007 में साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर और 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी वीसी सज्जनार ने वारंगल ज़िले में एसिड अटैक के तीन अभियुक्तों को पुलिस हिरासत में इसी तरह क्राइम सीन पर ले जाकर गोली मार दी थी. इस बार हैदराबाद केस के बाद हमने देखा कि लोगों ने सोशल मीडिया पर वारंगल की कहानी लिखकर सज्जनार को चैलेंज किया और कहा कि वे अब वैसा क्यों नहीं करते?

वो बताते हैं कि 90 के दशक में चंद्रबाबू नायडू जब सत्ता में आते हैं, तब से ऐसे एनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारियों को प्रमोशन दिये जाने लगे.

पर क्या सूबे में आज तक कभी किसी एनकाउंटर केस की जाँच के बाद पुलिस को दोषी पाया गया? इसके जवाब में वेणुगोपाल ने बताया, “1987-88 में एक मजिस्ट्रेट ने अपनी जाँच में पाया था कि पुलिस अफ़सर की दलीलें बेबुनियाद हैं और उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए. तो उस मामले का अंत ये हुआ कि मजिस्ट्रेट का ट्रांसफ़र कर दिया गया. इसलिए सरकार पुलिस के ख़िलाफ़ जाएगी या निष्पक्ष जाँच को सपोर्ट करेगी, ये उम्मीद कम लगती है.”

वेणुगोपाल कहते हैं, “बीते दो सप्ताह में तेलंगाना राज्य में हैदराबाद गैंगरेप-मर्डर जैसे तीन अन्य केस हुए हैं. लेकिन अन्य दो लड़कियाँ (एक वारंगल में और दूसरा आदिलाबाद में) दलित हैं, इसलिए उनपर अधिक चर्चा नहीं हुई. और ये भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है.”

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
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