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किसी अपराधी या आरोपी को पुलिस कब मार सकती है गोली, जानें क्या कहता है भारतीय कानून

हैदराबाद में महिला पशु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म और फिर हत्या मामले में अभियुक्त चार युवक पुलिस एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं। कई संगठन इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस संबंध में खुद संज्ञान लिया है और तुरंत एक टीम को घटनास्थल पर जांच के लिए जाने के निर्देश दिए हैं। इस टीम का नेतृत्व एक एसएसपी करेंगे और जल्द ही आयोग को अपनी रिपोर्ट सौपेंगे।

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photo credit- the economic times

इस एनकाउंटर की सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह शब्द एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। लोगों के बीच चर्चा होने लगी है कि क्या एनकाउंटर के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश बनाए गए हैं? एनकाउंटर के बारे में क्या कहता है भारत का कानून? किसी अपराधी या आरोपी को पुलिस कब मार सकती है गोली? इन सवालों के जवाब आगे की स्लाइड्स में पढ़ें।

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‘भारतीय कानून में ‘एनकाउंटर’

  • भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं है। पुलिस की भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और आरोपियों/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में आरोपी या अपराधी की मौत हो जाती है।
  • भारतीय कानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे नियम-कानून जरूर हैं, जो पुलिस को यह ताकत देते हैं कि वो अपराधियों या आरोपियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधी या आरोपी की मौत को सही ठहराया जा सकता है।

आमतौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का जिक्र ही करती है। आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी (CRPC) की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी खुद को गिरफ्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालातों में पुलिस उस अपराधी या आरोपी पर जवाबी हमला कर सकती है।
लेकिन…

ये भी हैं नियम

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश
मार्च 1997 में तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था। उसमें पुलिस द्वारा फर्जी एनकाउंटर्स की शिकायतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा था, ”हमारे कानून में पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी व्यक्ति को मार दे, और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि उन्होंने कानून के अंतर्गत किसी को मारा है तब तक वह हत्या मानी जाएगी।”
जस्टिस वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। उन्होंने दो हालात बताए जिसमें जवाबी कार्रवाई में आरोपी या अपराधी की मौत को अपराध नहीं माना जा सकता।

क्या हैं वो दो हालात?

  • पहला, अगर आत्मरक्षा की कोशिश में दूसरे व्यक्ति की मौत हो जाए।
  • दूसरा, सीआरपीसी की धारा 46 पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार देती है। इस दौरान किसी ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने की कोशिश, जिसने वो अपराध किया हो जिसके लिए उसे मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है, वह पुलिस पर हमला कर भागने की कोशिश करे और इस कोशिश में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अपराधी या आरोपी की मौत हो जाए।

इसके अलावा एनएचआरसी ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करे।

जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसके तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे।

जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका जाहिर की जाए तो उसकी जांच करना जरूरी है। जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के जरिए होनी चाहिए।

अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

एनकाउंटर पर क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश?

  • एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है।
  • 23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया।
  • इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
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