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अगर न्याय बन्दुक से करना है तो फिर अदालतों की क्या जरुरत ?

हैदराबाद कांड के चारों आरोपी पुलिस एनकाउंटर में मार गिराए गए हैं. आरोपी शुक्रवार तड़के तब मारे गए, जब उन्होंने हैदराबाद से करीब 50 किलोमीटर दूर शादनगर के पास चटनपल्ली से भागने की कोशिश की. उन्हें उसी स्थान पर गोलियों से भून दिया गया, जहां 27 नवंबर की रात को पीड़िता के साथ दरिंदगी करने का आरोप है. पुलिस के मुताबिक, क्राइम सीन रीक्रिएट करने के लिए आरोपियों को मौके पर ले जाया गया था. आरोपियों ने भागने की कोशिश की जिसके बाद पुलिस ने उन्हें मार गिराया.

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photo credit- hindustan times

लेकिन आप आरोपियों को सिर्फ इसलिए नहीं मार सकते, क्योंकि आप चाहते हैं. आप सिर्फ लोगो को खुश करने के लिए कानून हाथ में नहीं ले सकते ! वैसे भी उन्हें अदालत से फांसी की सजा मिलती. “अगर न्याय बंदूक से किया जाएगा तो इस देश में अदालतों की क्या जरूरत है?” लेकिन पुलिस ही जज बनकर न्याय करने लगी तो फिर लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका की आवश्यकता ही क्या है ?
अगर पुलिस को ही फैसला करने का अधिकार है तो न्यायलय पर ताला लगा देना चाहिए क्योकि ऐसी स्थिति में न्यायपालिका का कोई औचित्य ही शेष नहीं रह जाता है !!
इस देश में लोकतंत्र है, कानून है और न्यायपालिका है तो पुलिस को फैसला करने का अधिकार आखिर किसने दिया ?
इस देश का कानून कहता है की 100 अपराधी बेशक छूट जाए, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए,

हम किसी भी तरह से हैदराबाद काण्ड के दोषियों के पक्ष में नहीं है वो आरोपी थे न की दोषी, इसका फैसला एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत न्यायपालिका करती की वह दोषी है या नहीं और अगर दोषी है तो उनके इस जघन्य अपराध के लिए उन्हें क्या सजा मिलनी चाहिए यह न्यायपालिका का काम है न पुलिस का !
हैदराबाद पुलिस के इस क्रूरतम अपराध के लिए उस पर एफआईआर होनी चाहिए और न्यायपालिका के आदेशानुसार इस एनकाउंटर की जांच होना चाहिए !

बात सिर्फ हैदराबाद एनकाउंटर की नहीं है ऐसे ढेरो केस है जिनमे पुलिस ने वाहवाही लूटने के लिए निर्दोषो को फसाया है, जो अपनी लाचारी और और गरीबी के कारण इस सिस्टम से लड़ नहीं सकते
मसलन उत्तरप्रदेश के बहुचर्चित रेयान स्कुल के प्रदुम्न हत्याकांड में पुलिस ने दबाव के चलते बस कंडक्टर को ही आरोपी बना दिया और उसे प्रताड़ित किया गया जबकि सीबीआई जाँच में प्रदुमन की हत्या उसके ही सीनियर छात्र ने की थी ! पुलिस के इस एनकाउंटर पर तालिया बजने वाली भीड़ क्या यह बात जानती है वह निर्दोष किन मानसिक प्रताड़ना से गुजरा होगा ? हो सकता यही की कल आप भी इसी तरह निर्दोष होकर भी किसी केस में फसा दिए जाओ !

जहा एनकाउंटर हुआ वहां पुलिस के अलावा कोई मौजूद नहीं था, फिर आप कैसे कह सकते हो की वहाँ अपराधी ही थे या उन्होंने भगाने का प्रयास ही किया होगा ? पुलिस के अनुसार मुठभेड़ में आरोपी मारे गए लेकिन एक तर्क यह भी है की मुठभेड़ तो तब होती है जब सामने वाले पास भी हथियार हो, जबकि उन आरोपियों के पास कोई हथियार नहीं थे !

इस एनकाउंटर पर सवाल उठना और उठाना दोनों लाजिमी है क्योकि ये कोई नहीं जानता की वह चारो अपराधी ही हो,क्योकि कोर्ट ने अब तक उन्हें दोषी नहीं ठहराया था, या यह भी हो सकता है की भारी दबाव के कारण पुलिस ने जल्दबाजी में वाहवाही लूटने के लिए एक साजिश के तहत इसे अंजाम दिया हो, क्योकि हैदराबाद पुलिस का कथित एनकाउंटर खुद उसे ही सवालों के घेरे में खड़े करता है !

पुलिस द्वारा आरोपियों का एनकाउंटर करके न्यायालय की भूमिका निभाना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ है,जिस पर पुलिस के खिलाफ एफआईआर होना चाहिए और दोषी पुलिस अधिकारियो पर कड़ी कार्यवाही होना चाहिए क्योकि यह प्रत्यक्ष तौर पर मानवाधिकारों का उलंघन है !

रात में तीन बजे आरोपियों को घटनास्थल ले जाना फिर वह से उनका भागने का असफल प्रयास करना और फिर पुलिस एनकाउंटर में चारो की मौत हो जाना, क्या यह एक षड्यंत्र के तहत किया गया फर्जी एनकाउंटर नहीं प्रतीत होता ?
जो पुलिस को शाबाशी दे रहे है, उनके लिए तालिया बजा रहे है वो लोग जानते है क्या की सच में आरोपी भागने का प्रयास ही कर रहे थे ?

ऐसा ही एक मामला छत्त्तीसगढ़ से सामने आया था जब पुलिस ने 36 लोगो को नक्सली बता मार गिराया था जबकि बाद में पता चला की वो नक्सली थे ही नहीं !

क्या हमे यह मान लेना चाहिए की बड़े केसो में असफल होने पर पुलिस किसी को भी अपराधी बना देती हो ?क्योकि सच तो वही जानती है, क्या यह सम्भव नहीं है की पुलिस अपनी नाकामी छिपाने और जल्दबाजी की वाहवाही लूटने के लिए कई केसो में निर्दोषो को सलाखों के पीछे डाल देती है और फिर क़ानूनी प्रक्रिया में वह बेगुनाह साबित होते है लेकिन जब तक उनका जीवन नर्क बन जाता है जिसका आभास खुद अपराधी बन चुकी पुलिस को भी नहीं होता है !

हमारे देश की न्याय व्यवस्था, कानून बेशक लचीला है लेकिन न्याय जरूर मिलता है अगर न्याय में देरी होती है तो उसका भी कारण है
अगर हम आकंड़ो पर गौर करे तो भारत में 10 लाख लोगो पर महज 17 जज है, आज भी भारतीय अदालते जजों की कमी से जूझ रही है इसी कारण आज भी भारत में 3.10 करोड़ केस पेंडिग है !

पूर्व आईपीएस अफसर शारदा प्रसाद ने कहा खुद कहा की – सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति आनी नहीं चाहिए थी, जो भी सच है वो जांच से निकलेगा मगर भीड़तंत्र के साथ जाकर चटपट न्याय कर देना, मेरे ख्याल से जो भी हुआ है वो ठीक नहीं हुआ है !

पूरा देश चाहता है की ऐसे जंघन्य अपराधियों को फांसी की सजा मिले, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के तहत.इसके लिए स्पीडी जस्टिस हो. पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए. आज लोग एनकाउंटर से खुश हैं, लेकिन हमारा संविधान है, कानूनी प्रक्रिया है.’

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
कभी सही कभी गलत, जैसा आपका नजरिया !

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