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पापी पेट के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा मासूम, लाखो बच्चे आज भी बाल मजदूरी की चपेट में

पीतलनगरी निवासी दस वर्षीय सोनू घोड़ा गाड़ी चलाता है। पापी पेट भी हमसे क्या-क्या नहीं कराता। जो उम्र उसकी खेलने कूदने और और पढ़ने-लिखने की है, उस वक्त उसके नाजुक कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी है। सुबह से रात तक अगर जी तोड़ मेहनत करके चंद रूपये न कमाए, तो शायद उसके भाई, बहन और अपने कलेजे पर पत्थर रखकर उसे काम के लिए भेजने वाली मां को भूखा ही सोना पड़े।

शायद यही कुछ मजबूरियां सोनू और उस जैसे अनेकों मासूम बच्चों की हैं। 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना बाल मजदूरी के तहत आता है। जो दंडनीय अपराध है। शिक्षा का अधिकार जैसी सरकार की योजनाएं भी शायद इन बदनसीब बच्चों के लिए बेमानी ही हैं। उधर छोटे बच्चे के हाथ में घोड़ा गाड़ी होने से हादसा भी हो सकता है।

क्या है कानून

बाल मजदूर की स्थिति में सुधार के लिए सरकार ने 1986 में चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया। जिसके तहत बाल मजदूरी को एक अपराध माना गया। रोजगार पाने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तय की गयी। लेकिन इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिख रहा है।

नन्हों के अधिकार

  • अनुच्छेद 21 (ए): राज्य को 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य तथा मुफ्त शिक्षा देना कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
  • अनुच्छेद 24: बालश्रम को प्रतिबंधित तथा गैरकानूनी कहा गया है।
  • अनुच्छेद 39(ई): बच्चों के स्वास्थ्य और रक्षा के लिए व्यवस्था करने के लिए राज्य कानूनी रूप से बाध्य है।
  • अनुच्छेद 39(एफ): बच्चों को गरियामय रूप से विकास करने के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है।

मिलते हैं 300 रूपये

आज के समय में महंगाई के दौर में भी बाल मजदूरों को सुबह से शाम तक जी तोड़ मेहनत के बाद तीन सौ से पांच सौ रूपया प्रतिमाह दिए जाते हैं। इतने में ये बच्चे केवल अपना ही पेट भर पाते हैं। व्यापारियों द्वारा बच्चों को काम पर रखने का कारण भी यही है कि ये बच्चे बेहद कम तनख्वाह पर काम के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके अलावा होटलों, भोजनालयों व रेस्टोरेंट पर तो बच्चों को केवल दो वक्त की रोटी देकर सुबह से देर रात तक काम कराया जाता है।

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
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