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आतंकियों की शोक सभा मनाने वाले, जिहादियों के निष्ठावान प्रेमी, हिंसक वामपंथियों का काला इतिहास

हमने बचपन में स्कूली पाठ्य पुस्तक में एक पाठ पढ़ा था, “अब्बू खां की बकरी” पूरे पाठ में यही दिखाया गया, अब्बू खाँ अपनी बकरी से कितना प्यार करते है, बच्चों जैसा रखते है !! अंत मे बकरी का सामना घास चरते हुए, जंगल मे शेर से हो जाता है….. जहाँ अब्बू खां की निडर बकरी सींग मार मारकर शेर को भागने पर मजबूर कर देती है !! तब तो हम बच्चे थे, वामपंथियों की चाल को समझ नहीं सके। इन्होंने किस तरह हमे बेवकूफ बनाया! अब्बू ख़ाँ का सच हमसे छुपाया! हमे तो वामपंथियों ने यही बताया था, कि मुसलमान अपनी बकरियों से बहुत प्यार करता है, बच्चों जैसा ख्याल रखता है। बकरी बाजी जैसे गलत काम तो कर ही नही सकता !

हमे स्कूलों, कालेजो में हिन्दू कुप्रथा, कुरीतियों के बारे में तो पढ़ने को मिला, किँतु इस्लाम की कुरीतियों को हमसे छुपा दिया गया। हमें सती प्रथा, घूँघट प्रथा, छुआछुत सभी के बारे में पढ़ाया गया परन्तु बुर्का , हलाला, तीन तलाक, मयस्सर,कन्फेंशन आदि कुरीतियों के बारे में हमें क्यो नहीं पढ़ाया गया….? वामपंथी इतिहासकारों बुद्धिजीवियो, पूर्व की कांग्रेस सरकारों ने हमे अंधेरे में रखा सिर्फ हिन्दू धर्म को नारी विरोधी, अंधविश्वासी, ढकोसला बताया अन्य धर्म के अंधविश्वास से दूर रखा, या यूँ कहे जानबूझकर उनकी कुरीतियों को ढांककर रखा …?

वामपंथियों ने कभी भी भारत को एक देश के तौर पर मान्यता नहीं दी और न ही कभी स्वयं को भारतीय माना। यही कारण है कि इस पार्टी ने सबसे पहले पाकिस्तान के निर्माण और देश के विभाजन का बकायदा समर्थन किया और पाकिस्तान निर्माण की मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए इन्होंने भाषा के आधार पर भारत के 17 टुकड़े करने की मांग उठाई। क्योंकि ये लोग भारत को एक देश नहीं, बल्कि विभिन्न भाषाओं-संस्कृतियों का समूह भर मानते हैं।

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इन्हीं वामपंथियों ने कभी महात्मा गांधी को साम्राज्यवाद का दलाल कहा। इन्ही वामपंथियों ने महात्मा गाँधी के लंगोटी धारण करने को नौटंकी बताई थी, गांधी की लंगोटी में कम्युनिस्टों ने समाजवाद के दर्शन नहीं देखे ।
इन्ही कम्युनिस्टों ने गांधी को ‘खलनायक’ और जिन्ना को ‘नायक’ की उपाधि दे दी थी।

आज़ादी के संघर्ष के दौरान वामपंथियों की अंग्रेजों से यारी तो जगत प्रसिद्ध है ही। अंग्रेजों के जाने के बाद भी वामपंथियों का भारत विरोध थमा नहीं बल्कि वे लगातार भारत विरोधियों के साथ मिलकर काम करते रहे और लेनिन और माओ के इशारे पर भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते रहे। आज़ादी के पश्चात अनेक वर्षों तक वामपंथियों ने भारतीय संविधान की उलेहना की और उसे स्वीकारने से भी इंकार किया।

कश्मीर और देश के अन्य भागों में पाकिस्तान पोषित जिहादी आतंकवाद हो या देश के अनेक राज्यों में खून की होली खेल रहे नक्सलवादी हों, वामपंथी सदा ही उनका समर्थन और पोषण करते आये हैं।
वामपंथी लेखक अरुंधति रॉय का अलगाववादी नेता यासीन मलिक से याराना तो जगजाहिर है जिनके हाथ में हाथ डाले यह मोहतरमा घूमती है, वही यासीन मलिक जिसके नेतृत्व में जेकेएलएफ के आतंकवादियों ने श्रीनगर के बाहरी इलाके में वायुसेना के जवानों पर हमला किया था.

सारे कम्युनिस्ट जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्हैया कुमार की सहायता के लिए खुलकर मैदान में उतरे हुए हैं। वह कश्मीर को भारत का अंग मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अब तो उन्होंने खुलेआम यह घोषणा करनी शुरू कर दी है कि कश्मीर पर भारत ने जबरन कब्जा कर रखा है। यही वामपंथी पाकिस्तान में जा कर और विश्व मंचों पर भारत को कारगिल युद्ध का जनक कहते हैं।

यह दुर्भाग्य की बात है की देश के अधिकांश शिक्षण संस्थान और मीडिया पुरी तरह इन गद्दार वामपंथियों की जकड़ में हैं जिसके कारण छात्र छात्राएँ भी दिग्भ्रमित होकर आतंकवादियों अलगावादियों नक्सलियों और वामपंथियों के समर्थक बन देश से गद्दारी करने लगे हैं। इन संस्थानों को इन गद्दारों से मुक्त कराए बगैर देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता अन्यथा इन संस्थानों में उपस्थित कन्हैया, खालिद, अनिर्बान जैसे गद्दार वामपंथी इन्हीं संस्थानों में बैठकर सैनिकों की शहादत पर जश्न मनाएँगे, आतंकवादियों की मौत पर उनके लिए शोकसभा करेंगे, दुर्गापूजा के समय महिषासुर की पूजा करेंगे। बीफ-पार्टी मनाएँगे, हिन्दू देवी देवताओं की खिल्ली उड़ाएँगे, खुलेआम भारत विरोधी बातें करेंगे और सब कुछ ढर्रे पर चलता रहेगा।

हम क्या चाहें आजादी, हक हमारा आजादी। कहकर लेंगे आजादी, कश्मीर मांगे आजादी। केरल मांगे आजादी। बस्तर मांगे आजादी।
भारत मुर्दाबाद। पाकिस्तान जिंदाबाद। …. अफजल गुरु तुम जिंदा हो, हर एक लहू के कतरे में। जैसे देशद्रोही नारे इन्हीं कम्युनिस्टों की गंदी जुबान से निकल सकता है।
हिंदू और हिंदुस्तान से तो इनकी जन्मजात दुश्मनी जगजाहिर है।
एक ओर तो कम्युनिस्ट धर्मनिरपेक्षता का नकाब ओढ़ते हैं और दूसरी ओर वह जमाते इस्लामी जैसी अतिवादी इस्लामी संगठनों से रिश्ते जोड़ते हैं।

चूँकि वामपंथियों का अब पतन हो चूका है या यु कहे की यह पराजित हो चुके है , इसलिए हमारे कम्युनिस्टों ने अपनी बची-खुची शक्ति ईसाई एवं इस्लामीक साम्राज्यवाद को मदद पहुंचाने एवं हिन्दू धर्म के विरोध में लगा दी है। कम से कम इससे उन्हें अपने शत्रु ‘हिन्दुत्व को कमजोर करने का सुख तो मिलता है।
इसीलिए भारतीय वामपंथ हर उस झूठ-सच पर कर्कश शोर मचाता है जिससे हिन्दू बदनाम हो सकें।
अत: प्रत्येक किस्म के कम्युनिस्ट मूलत: हिन्दू विरोधी हैं। केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रंग में होती है।

विचारधारा के प्रति समर्पण के किस्सों के बावजूद भारत का वामपंथी आंदोलन क्यों जनता के बीच स्वीकृति नहीं पा सका ? क्योकि भारत की महान जनता पहले से ही इन राष्ट्रद्रोहियो को पहचानती थी इसलिए इन्हे इनकी मौत मरने दिया ! जो हर बार गलती करे और उसे ऐतिहासिक भूल बताये वही वामपंथी है !

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
कभी सही कभी गलत, जैसा आपका नजरिया !

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