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जयंती विशेष/ ‘इंतजार करने वालो को उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते है’ कलाम का संघर्ष भरा सफर, जो बना युवाओं का प्रेरणास्त्रोत

भारतीय इतिहास में 15 अक्टूबर का दिन बेहद खास है. भारत को मिसाइल और परमाणु शक्ति संपन्न बनाने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजी अब्दुल कलाम आज के ही दिन जन्मे थे. कलाम जितने महान वैज्ञानिक थे, उतने ही शांत व्यक्ति जिनके मन में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना पलता था.

कलाम की अगुवाई में भले ही भारत में सबसे खतरनाक और घातक डिफेंस मिसाइलों का निर्माण हुआ हो, लेकिन वे हमेशा बेहद और सहज और सरल नेता के तौर पर दुनिया को नजर आए.

कलाम का व्यक्तित्व पूरी दुनिया के लोगों के लिए प्रेरणास्पद रहा है. वे जितने अच्छे वैज्ञानिक थे, उतने ही अच्छे इंसान. किसी को भी तकलीफ पहुंचाना उन्हें बिलकुल मंजूर नहीं था. चाहे इंसान हो या जानवर.

उम्र-भर ख़्वाब-ए-मोहब्बत से न बेदार हुए
इसी किरदार से हम साहब-ए-किरदार हुए

साहब-ए-किरदार होने के सलीके को किसी से सीखना हो तो एपीजे अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व से सीखना चाहिए. कलाम होना इसलिए भी आसान नहीं है क्योंकि उसके लिए संघर्षों की आग में तपना पड़ता है. कलाम साहब का कहना था कि बनावटी सुख की बजाय ठोस उपलब्धियों के पीछे समर्पित रहिए. यही उनके जीवन का एकमात्र मंत्र भी था. वह किसी भी तरह से बनावटी नहीं थे. वह तो बस ख्वाब देखते थे और उसको पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत करते थे. इसी कारण दुनिया उन्हें ‘मिसाइल मैन’ के तौर पर याद करती है.

एपीजे अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व को किसी एक दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता. जिंदगी ने जब उन्हें जिस भूमिका को निभाने का दायित्व सौंपा, वह उसपर खरे उतरे. वे देश के राष्ट्रपति रहे, एक महान विचारक रहे, लेखक रहे और वैज्ञानिक भी रहे. हर क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा. कलाम की ज़िंदगी का सार है ख्वाब देखिए, ख़्वाब पूरे जरूर होते हैं. चाहे परिस्थितियां कैसी भी रहे. ख़्वाब के बारे में उनका ख़ुद का कहना है ‘‘ख़्वाब वह नहीं होते जो हम सोते हुए देखते हैं, बल्कि ख़्वाब वह होते हैं जो हमें सोने ही न देते’’

कैसा रहा कलाम का सफर?

  • साल 1962. कलाम पहली बार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र(ISRO) पहुंचे. कलाम प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे जब भारत ने अपना स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया. कलाम ने स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया, जिसके चलते अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय तकनीक बनीं.
  • सन 1992 से 1999 तक कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे. जब वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दोबारा न्यूक्लियर टेस्ट किया तब कलाम ने बड़ी भूमिका निभाई.
  • कलाम की अगुवाई में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च वेहिकल (रेक्स) पर खूब काम हुआ. पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग नाम के मिसाइलों का निर्माण हुआ.

ऐसे बने मिसाइल मैन

साल 1985, महीना सितंबर. त्रिशूल का परिक्षण. फरवरी 1988 में पृथ्वी और मई 1989 में अग्नि का परीक्षण किया गया. इसके बाद 1998 में रूस के साथ मिलकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया और ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई. ब्रह्मोस धरती, आसमान और समुद्र कहीं से भी प्रक्षेपित किया जा सकता है. इस सफलता के बाद कलाम को मिसाइल मैन की ख्याति मिली.

नासा से लौटकर बनाया पहला स्वदेशी उपग्रह ‘नाइक अपाची’

इसके बाद कलाम ने ‘इंडियन कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ का इंटरव्यू दिया. यहां उनका इंटरव्यू विक्रम साराभाई ने लिया लिया और वह चुन लिए गए. उनको रॉकेट इंजीनियर के पद पर चुना गया. यहां से कलाम के ख्वाब को पंख मिले. उन्हें नासा भेजा गया. नासा से लौटने के बाद उन्हें ज़िम्मेदारी मिली भारत के पहले रॉकेट को आसमान तक पहुंचाने की. उन्होंने भी इस ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभाया. रॉकेट को पूरी तरह से तैयार कर लेने के बाद उसकी उड़ान का समय तय कर दिया गया, लेकिन उड़ान से ठीक पहले उसकी हाईड्रोलिक प्रणाली में कुछ रिसाव होने लगा. फिर असफ़लता के बादल घिर कर आने लगे, मगर कलाम ने उन्हें बरसने न दिया. रिसाव को ठीक करने का वक़्त न हो पाने की वजह से कलाम और उनके सहयोगियों ने रॉकेट को अपने कंधों पर उठाकर इस तरह सेट किया कि रिसाव बंद हो जाए. कलाम ने रॉकेट को कंधों पर नहीं उठाया था, बल्कि उस ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया था जो उन्हें नासा से लौटने के बाद दी गई थी. फिर भारत के सबसे पहले उपग्रह ‘नाइक अपाची’ ने उड़ान भरी. रोहिणी रॉकेट ने उड़ान भरी और स्वदेशी रॉकेट के दम पर भारत की पहचान पूरी दुनिया में बन गई.

इसके बाद कलाम की भव्यता और भव्य हो गई. दुनिया उन्हें जानने लगी. उन्होंने अपनी मेहनत और साधारण पृष्ठभूमि की सादगी को जीवन भर बनाए रखा. उनकी सादगी किसी भी बाहरी चमक दमक की मोहताज नहीं होती.

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
कभी सही कभी गलत, जैसा आपका नजरिया !

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