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अंदरूनी आतंकवाद: अलगाववाद, नक्सल-माओवाद, जानिए क्या है इनका कच्चा चिट्ठा

यु तो भारत और पूरी दुनिया आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या से जूझ रही है,लेकिन भारत सिर्फ बाहरी आतंकवाद ही नहीं बल्कि अंदरूनी आतंकवाद से भी जूझ रहा है,आइये आज हम आपको विस्तृत में बताते में उस अंदरूनी आतंकवाद के बारे में और क्या है ये ?

अलगाववाद

भारत के कुछ हिस्सों में अलगाववाद शब्द की चलती चलने सी लगी थी, जो अनुच्छेद 370 के खात्मे के साथ ही अब थम सी गयी हे ।

आखिर ये अलगाववाद क्या हैं?

अपने जन्म के तत्काल बाद से ही भारतीय राष्ट्र-राज्य अलगाववाद की समस्या से जूझ रहा है, जिसने धीरे-धीरे खतरनाक आतंकवाद का रूप ले लिया है। वह अफगानिस्तान-पाकिस्तान के पड़ोस में रह रहा है, जो दुनिया में आतंकवाद की सबसे बड़ी स्थली हैं।
अलगाववादी एक ऐसा व्यक्ति जो एक समूह, समाज, संस्कृति या धर्म को तोड़ने का समर्थन करता है, वो अलगाववादी कहलाता है। अलगाववाद शब्द की उत्पत्ति 16 वीं शताब्दी में Protestants शब्द से जो चर्च ऑफ इंग्लैंड से अलग करने के लिए हुई थी लेकिन आज अलगाववाद हमारे देश में कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। अलगाववाद आतंकवाद के पोषक बन गए है !

भारत के गृहमंत्रालय द्वारा कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के फोन और मोबाईल की बातचीत ट्रेस की गई है जिससे पता लगा है कि वे खुद अपने कश्मीरी लोगों की मौत चाहते हैं ताकि ये मामला गंभीर बना रहे और वो देश को तोड़ने की साजिश में सफल हो सके।
इस फोन टैपिंग के मुताबिक -एक शख्स गुलाम अहमद डार दूसरे शख्स शब्बीर अहमद वानी से कह रहा है कि 20,000 लोगों की भीड़ मागाम से निकली है, और बडगाम की तरफ बढ़ी है। इस बातचीत के दौरान वानी ने कहा, तुम लोग घर पर बैठ कर पैसे ले रहे हो और कुछ नहीं कर रहें हो।
डार ने इसके जवाब में कहा, कि कभी कभी भीड़ को संभाल पाना मुश्किल हो जाता है। इसके बाद भीड़ को संभालना मुश्किल होता है। उसके बाद में डार ने कहा, आज कम से कम 15 लोग शहीद होने चाहिए। इसके बाद बातचीत खत्म हो गई।

कश्मीर हिंसा और अलगाववादी द्वारा देश तोड़ने की साजिश को देखते हुए मोदी सरकार अब वहां के अलगाववादी नेताओं के खिलाफ सख्ती का मन बना रही है। बताया जा रहा है कि अब उनके पासपोर्ट जब्त हो सकते हैं। साथ ही उस सभी की जेड सिक्योरिटी भी वापस ली जा सकती है। आखिर इतने वर्षो तक पिछली कांग्रेस की सरकार ने करोड़ो रुपये इन अलगाववादी नेताओ पर क्यों बरसाये ये जांच का विषय है ? और देश के साथ गद्दारी भी है। आज इस देश की जनता समझ चुकी है की कांग्रेस ने सिर्फ वोट बैंक के लिए देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया है, जिसकी सजा इस देश की आने वाली नस्ले भुगतेगी।

हमारे देश के सरकारी पैसो से अलगाववादी नेता फाइव स्टार होटलों में ठहरते हैं और सरकारी गाड़ियों में घूमते हैं। लगभग एक हजार सरकारी सुरक्षाकर्मी सालभर उनकी सुरक्षा में तैनात रहते हैं। यहां तक कि सरकार सालाना उनके खाने-पीने के करोड़ों रुपये का बिल भी अदा करती है, और फिर ये लोग देश विरोधी बयान देते है और देश को तोड़ने की मंशा लिए कार्य करते है , लेकिन वर्तमान सरकार और पिछली सरकार में यही तो फर्क है की देश को तोड़ने वाले लोगो के साथ नहीं अपितु जोड़ने वालो के साथ है, और होना भी चाहिए , क्योकि यहाँ पर सवाल देश और राष्ट्र धर्म का है। जो कल तक कश्मीर घाटी में सरकार के खिलाफ बंद और प्रदर्शन करते थें। अब वहां पर उनके खिलाफ भी आवाजे उठनी शुरू गई हैं।
कुल मिलकर अब अलगाववाद की कमर टूट चुकी है !

नक्सलवाद & माओवाद

दोनों ही विचारधारा में महीन सा फर्क है,दोनों ही अब हिंसा से सरकार पर नियंत्रण रखना चाहते है,और हथियारों से सामाजिक व् आर्थिक उत्थान चाहते है.ये राजनितिक वर्चस्व के लिए भी हथियारों का प्रयोग बेहतर समझते है और हर चीज़ गोलियों की धांय धांय से पाना चाहते है !
दोनों ही माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के बैनर तले अब एक हो गए है !
देश के 180 जिलों यानी भारत के भूगोल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवादियों या माओवादियों के कब्जे में है, जो देश के 10 राज्यों-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है। इस इलाके का नाम ही ‘रेड कॉरिडोर’ पड़ गया है। कुल नक्सल प्रभावित इलाका 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

क्या चाहते हैं माओवादी ?

माओवादी चाहते हैं कि उनका नियंत्रण सरकार पर हो और राज्य में उनकी सरकार चले। वो चाहते हैं कि पूरे देश में उनकी विचारधारा का वर्चस्व हो।

क्या चाहते हैं नक्सलवादी ?

नक्सलवादी चाहते हैं कि उनका वर्चस्व उनका हो, नियंत्रण भी उनका हो, लेकिन जब बात उत्थान की आये तो समाज में सबको बराबरी का अध‍िकार भी देना चाहते हैं। ये लोग पिछड़ों की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं करते।

एक अनुमान के अनुसार कुल 30 हजार सशस्त्र नक्सली हैं जिसका नियमित कॉडर कम से कम 50 हजार लोगों का है। इनके पास आधुनिक आग्नेयास्त्र हैं और जगह-जगह बारूदी सुरंगों का जाल बिछाकर ये हमारे सुरक्षा बलों को छकाते रहते हैं। पिछले साल अप्रैल में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा इलाके में दो बड़े हमले किए थे, जिनमें केंद्रीय आरक्षी पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 76 लोग मारे गए थे। इन तमाम जिलों में रहने वाले ग्रामीण और आदिवासी नक्सलवादियों के रहमो-करम पर जीते हैं। उनकी समानांतर व्यवस्था है।

नक्सलवादी लोगों से टैक्स वसूलते हैं, तथाकथित वर्ग शत्रुओं का सफाया करते हैं और अपनी अदालतें बैठाकर तथाकथित न्याय करते हैं। वे जंगल-वारफेयर में बार-बार अपनी श्रेष्ठता साबित कर चुके हैं और कई बार जेलों पर हमले करके अपने साथियों को छुड़ा ले गए हैं। इन्हीं नक्सलियों ने 2009 में लालगढ़ में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार को अपनी ताकत दिखाई थी। पहले भी कई बार नक्सलियों से हथियार रखने और बातचीत करने की अपीलें की गई हैं, मगर बात प्रायः नहीं बनती। अब तो चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग की विचारधारा से प्रेरणा लेकर नक्सलवादी खुलेआम सशस्त्र क्रांति की बात करने लगे हैं, हालाँकि खुद चीन में आज माओ का नाम लेने वाले विलुप्त होते जा रहे हैं। इसे समझा जाना चाहिए।

इन नक्सलियों के प्रेरणास्रोत भले ही माओ हों, पर ये सभी हैं तो भारत के नागरिक ही।
इनमें मुठ्‌ठी भर देश विरोधी भी हो सकते हैं, मगर ज्यादातर तो गरीब आदिवासी लोग ही इस आंदोलन में शामिल हैं। इसलिए राज्य को इन्हें समझा-बुझाकर मुख्यधारा में लाना चाहिए और वे समस्त कारण समाप्त करने चाहिए जो एक निर्दोष नागरिक को नक्सली बनाते हैं। एक बड़ी पहल तो केंद्र को ही करनी होगी। सिर्फ समस्या को बड़ा बताने भर से तो समस्या का हल नहीं निकलेगा।

Written by Ojas Nihale

एक लेखक अपनी कलम तभी उठाता हैं, जब उसकी संवेदनाओ पर चोट हुई हों !! पत्रकारिता में स्नातकोत्तर...
कभी सही कभी गलत, जैसा आपका नजरिया !

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